Saturday, November 2, 2019

The joy of life


              THE JOY OF LIFE

The scriptures tell us that - the pleasure we are looking for will not be found in the outside world.  There is an ocean of bliss in us.  Self-realization means the attainment of complete joy and peace hidden within us.  Our nature is like a bottomless sea of ​​joy and peace.  But our nature has been changed by worldly practices.  Our thoughts are only reflections of world views.  But we ourselves are the result of our own actions and desires.  We have forgotten our true nature by being bound in worldly bonds.  This change has come from family religious and moral values.  These practices have been going on for centuries, which most people do not refute and accept it.
 Our outer world is only a projection of our inner world.  In fact, our outside world is an exact replica of our inside world.  Our inner world is made up of our thoughts.  Because we have forgotten our true nature, this is why the world inside us is greatly influenced by the world outside us.  If there is disturbance in the inner world, then we find the outside world also indifferent and hopeless.



             जीवन का आनंद

शास्त्र हमें बताते हैं कि -- जिस आनंद की हम तलाश कर रहे हैं वह हमें बाहरी दुनिया में प्राप्त नहीं होगा। हमारे अंदर परमानन्द का एक सागर है। आत्म बोध का अर्थ है हमारे भीतर छिपे सम्पूर्ण आनंद एवं शांति की प्राप्ति। हमारा स्वरूप एक आनंद एवं शांति के अथाह समुद्र के समान है। परंतु हमारा स्वरूप सांसारिक प्रथाओं के द्वारा परिवर्तित कर दिया गया है। हमारे विचार संसार के विचारों का ही प्रतिबिंब हैं। परंतु हम स्वयं अपने कर्मों एवं मनोकामनाओं के ही परिणाम हैं। हम सांसारिक बंधनों में बंध कर अपने वास्तविक स्वरूप को भूल चुके हैं। यह परिवर्तन पारिवारिक धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों से आया है। सदियों से ये प्रथायें चली आ रही हैं जिन को अधिकतर व्यक्ति खंडित नहीं करते हैं और इसे स्वीकार कर लेते हैं।
हमारी बाहरी दुनिया हमारी भीतरी दुनिया का केवल एक प्रक्षेपण है। वास्तव में, हमारी बाहर की दुनिया, हमारी अंदर की दुनिया की एक सटीक प्रतिकृति है। हमारी भीतरी दुनिया हमारे विचारों से ही निर्मित है। क्योंकि हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूल चुके हैं, इसी कारण हमारे भीतर की दुनिया हमारे बाहर की दुनिया से बहुत प्रभावित होती है। यदि भीतर की दुनिया में अशांति हो, तो हमें बाहर की दुनिया भी उदासीन एवं निराशाजनक लगती है। जय राधे...!!!

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