Sunday, October 27, 2019

Divine love


This rule of a king in ancient times
 Was that he would donate to countless ascetics
 Only after meals.  One day due
 One before time
 The monk took his small beggar
 Standing at the door.  He told the king -
 "Rajan, if possible in this little character of mine
 Put anything. "
 The words of the petitioner knocked the king but he
 Could not say anything to him.  He his
 Told the servants that the pot of gold
 Be filled with coins.  As in that character
 Gold coins were poured, they fell into it and disappeared
 Have become.  It happened again and again.  till evening
 The king's entire treasure is empty but he
 The character remained empty.  Ultimately the king is the yacht
 Swaroop came with folded hands and he asked the monk
 Asked - "Forgive me, I thought that my
 No empty hand can ever go through the door.
 Now please tell me the secret of this character too.
 Why does it never fill up? ”The monk said -
 “This character is made from the heart of man.  This world
 That nothing filled man's heart
 Can.  No matter how much name, fame, power, wealth,
 Beauty, and pleasure

 Always demands more.  Only god

 Only love is able to fill it.


प्राचीन काल में एक राजा का यह नियम
था कि वह अनगिनत संन्यासियों को दान देने के
बाद ही भोजन ग्रहण करता था. एक दिन नियत
समय से पहले ही एक
संन्यासी अपना छोटा सा भिक्षापात्र लेकर
द्वार पर आ खड़ा हुआ. उसने राजा से कहा –
“राजन, यदि संभव हो तो मेरे इस छोटे से पात्र में
भी कुछ भी डाल दें.”
याचक के यह शब्द राजा को खटक गए पर वह
उसे कुछ भी नहीं कह सकता था. उसने अपने
सेवकों से कहा कि उस पात्र को सोने के
सिक्कों से भर दिया जाय. जैसे ही उस पात्र में
सोने के सिक्के डाले गए, वे उसमें गिरकर गायब
हो गए. ऐसा बार-बार हुआ. शाम तक
राजा का पूरा खजाना खाली हो गया पर वह
पात्र रिक्त ही रहा. अंततः राजा ही याचक
स्वरूप हाथ जोड़े आया और उसने संन्यासी से
पूछा – “मुझे क्षमा कर दें, मैं समझता था कि मेरे
द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं जा सकता.
अब कृपया इस पात्र का रहस्य भी मुझे बताएं.
यह कभी भरता क्यों नहीं?” संन्यासी ने कहा –
“यह पात्र मनुष्य के ह्रदय से बना है. इस संसार
की कोई वस्तु मनुष्य के ह्रदय को नहीं भर
सकती. मनुष्य कितना ही नाम, यश, शक्ति, धन,
सौंदर्य, और सुख अर्जित कर ले पर यह
हमेशा और की ही मांग करता है. केवल ईश्वरीय
प्रेम ही इसे भरने में सक्षम है.”

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