Tuesday, October 29, 2019

Why did Bhagban Shiva take Ardhanarishwar form and what was its purpose !!








Why did Bhagban Shiva take Ardhanarishwar form and what was its purpose !!



 At the beginning of the creation, when the mental creation created by Brahmaji could not expand, then Brahmaji felt very sad.  At the same time, All India Radio became Brahman!  Now create Maithuni.  On hearing Akashvani, Brahmaji decided to create Maithuni creation, but by that time, due to the absence of women, he could not succeed in his determination.  Then Brahmaji thought that Maithuni cannot be created without the grace of God Shiva.  So they started doing harsh penance to please them.  For a long time, Brahmaji kept lovingly meditating on Maheshwar Shiva in his heart.  Pleased with his intense tenacity, Lord Uma-Maheshwar appeared to him in the form of Ardhanarishwar.  Maheshwar Shiva said- Son Brahma!  I am extremely happy with the difficult penance you have done for the growth of the subjects.  I will definitely fulfill your wish.  Saying this, Shivji separated Uma Devi from half of her body.  Brahma said. - So far I have failed to create a proper creation.  Now I want to expand the world by generating people from the confluence of men and women.  Parmeshwari Shiva manifested a power similar to his own, from the middle part of his eyebrows.  That power of Shiva for creation of the world became Dakshi's daughter as per the request of Brahma.  In this way, Goddess Shiva entered into the body of Mahadev Ji by obliging Brahmaji and giving him unmatched strength, this is the secret of Ardhanarishwar Shiva and from this onwards the creation of the operation, whose regulator is Shiva Shakti.

भगबान शिव ने अर्द्धनारीश्वर रूप क्यों रखा और उसका क्या प्रयोजन था !!


सृष्टि के प्रारंभ में जब ब्रह्माजी द्वारा रची गई मानसिक सृष्टि विस्तार न पा सकी, तब ब्रह्माजी को बहुत दुःख हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई ब्रह्मन्! अब मैथुनी सृष्टि करो। आकाशवाणी सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय तो कर लिया, किंतु उस समय तक नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने निश्चय में सफल नहीं हो सके। तब ब्रह्माजी ने सोचा कि परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती। अतः वे उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगे। बहुत दिनों तक ब्रह्माजी अपने हृदय में प्रेमपूर्वक महेश्वर शिव का ध्यान करते रहे। उनके तीव्र तप से प्रसन्न होकर भगवान उमा-महेश्वर ने उन्हें अर्द्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिया। महेश्वर शिव ने कहा- पुत्र ब्रह्मा! तुमने प्रजाओं की वृद्धि के लिए जो कठिन तप किया है, उससे मैं परम प्रसन्न हूं। मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा। ऐसा कहकर शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमा देवी को अलग कर दिया। ब्रह्मा ने कहा.-एक उचित सृष्टि निर्मित करने में अब तक मैं असफल रहा हूं। मैं अब स्त्री-पुरुष के समागम से मैं प्रजाओं को उत्पन्न कर सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूं। परमेश्वरी शिवा ने अपनी भौंहों के मध्य भाग से अपने ही समान कांतिमती एक शक्ति प्रकट की। सृष्टि निर्माण के लिए शिव की वह शक्ति ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार दक्षकी पुत्री हो गई। इस प्रकार ब्रह्माजी को उपकृत कर तथा अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेव जी के शरीर में प्रविष्ट हो गईं, यही अर्द्धनारीश्वर शिव का रहस्य है और इसी से आगे सृष्टि का संचालन हो पाया, जिसके नियामक शिवशक्ति ही हैं।







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